तीसरी भैंस

फ़रवरी 6, 2008

मैं अनुवाद कार्य करता था, रिपोर्टिंग करता था, हिसाब किताब का काम करता था,जिससे मुझे अतरिक्त आमदनी
हो सके में एक योग्य,और उत्साही युवा था,और इसलिए मुझे काम पाने में बड़ी मुस्किले आयी,जो काम मिला वह भी भीख सा था,मुझे पेंटिंग का शौक था,साहित्य में रूचि थी,चाहता था क्लासिक उच्चकोटि के चित्र खरीदूं,चाहता था गोर्की,नेहरू,लेनिन मेरी आलमारी में हो,चाहता था ऐसा हो,जिसमे मैं और एक कमरा मेरी चाहत के सिवा कुछ न हो ,मैं भौतिकता का नही,कला संस्कृति-वौचारिकता का भूखा था.
पर मेरी इनकम ने मुझे ऐसा दुबला बना दिया था कि मुझे यह सब सपना लगता था.
तभी एक दिन मेरे एक मित्र ने मुझे बताया कि मैं एक भैस पाल लूं.उसने पूरा हिसाब करके बताया कि भैंस कैसे और कितनी लाभकारी होती सकती है,और यदि मैं खुद घास,खली खरीदता रहू तो और लाभकारी होगा.
बात मुझे जम गयी,भैस मुझे अतरिक्त कामों से मुक्ति दे सकती थी,और लाभ और कामो के आमदनी से अधिक था.
मैंने कर्ज ले लिया और भैस खरीद ली,मेरे मकान के पीछे आँगन भी था.पत्नी ने विरोध किया था,सो भैस के आते ही उसे दुर्गन्ध आने लगी-उसके गोबर की,मूत्र की,शकायत करने लगी-मच्छर नही थे अब पैदा हो गए,इस पर मैंने उससे कहा-”भैस के दूध को देखो,उससे होने वाले लाभ को देखों,उससे पैदा होने वाली प्रदूषण को मत
देखो.
वास्तव में दुर्गन्ध मुझे भी आती थी,लेकिन मैंने जाहिर नही किया,आँगन पश्चिम की और था और उन दिनो हवाएं पश्चिम की और से ही चल रही थी,जिससे दुर्गन्ध सारे घर में भर जाती थी.

रोज शाम मैं बड़े चाव से घास-खडी खरीदने जाता था,प्रति रविवार बडे चाव से भैस को नहलाता और अपने यहाँ आने वाले लोगो को बड़े चाव से भैस दिखाता एक आदमी था जो आँगन साफ कर जाता,भैस को दूह जाता,इसके बावजूद मैं भी बडे चाव से आँगन को और धोता और कभी-कभी भैस को भी दूहता.
लाभ इतना हो रहा था कि मैं अधिक-से-अधिक भैस मैं डूबता जा रहा था. इसके पीछे कई बार मेरा अखबार पढ़ना
रह जाता,बल्कि अब मैं अखबार ऊपर-ऊपर ही पढता,गहरे या विस्तार में ना जाता.भैस के पीछे वेतन का कार्य गौण हो गया.यह लाभ का प्रधान कार्य बन गया.लाभ इतना हो रहा था की देखते-देखते कर्ज से मुक्ति मिल गयी
और पैसे की काफी बचत भी हुई.इस बचत में से मैंने एक भैस और खरीद ली.
दों भैसों के साथ मेरा व्यक्तित्व जैसे ऊपर उठा,में वेतन के कार्य को गौण मानने लगा .पत्नी ने कहा,”नौकरी छोड़ दो,किसी बेरोजगार को काम मिलेगा.मैंने कहा “प्राइवेट होती तो छोडनी पड़ती, सरकारी है,जो बिना काम किए चलती है सो क्यों छोडूं.”

मेरा रुतबा बढ़ने लगा,कैसे न बढ़ता.अब मेरे मकान का नाक-नक्श बदल गया था,घर में अब सोफासेट,फ्रिज,टीबी था,दरवाजे पर स्कूटर था.
एकदिन एक परिचित ने,जो सड़क पर मिल गया था,बात-बात में कहा,”आपके कपडों में गोबर की कैसी गंध आ रही है?”
यह सुना नही कि मैं चिढ कर बोला, “मेरे कपड़े आपसे कही ज्यादा उजले हैऔर कीमती भी,पत्नी उस परिचित के आगे बढ़ जाने पर बोली,तुम व्यर्थ चिढ़ते हो,हमारे कपडों में गोबर की गंध आती है,मेरी सहेलियां भी शिकायत करती है,कपडें हमारे औरो से ज्यादा कीमती है और उजले भी,पर गोबर के कारण कपडों के साथ-साथ गंध हमारे आचरण और विचार में भी आ गई है.”
“आचरण और विचारमें गोबर की गंध.तुम्हारा सिर तो नही फिर गया है? ” मैंने कहा.
पत्नी बोली यह,”गोबर की गंध नही थी की तुमने हमारे मोहल्ले की जमीन खेल मैदान के लिए स्कूल वालो को नही मिलने दिया,किशनलाल से कहा कि शराब के ठेकेदार को बेचो,वह ज्यादा पैसे दे रहा है,गरीब रिश्तेदार के यहा तुम शादी में नही गए,करीब न होते हुए अमीर रिश्तेदारों के यहा गए, पहले तुम्हे छोटे लोगो से हमदर्दी थी.पड़ोस के पी एच डी को तुम नालायक कहते हो क्योकि वह बेरोजगार है.पहले तुम उसका आदर करते थे.
यह सुन मैं कुछ न बोला.घर की ओर का शेष रास्ता हम मौन ही चले .
अब मैं तीसरी भैस खरीदने के बारे में सोच रहा था.पत्नी से कहा तो विरोध करते हुए बोली, “क्या दो भैसों से दिल नही भरा,जिन्दगी में भैस ही सब कुछ है क्या?”
“क्यों नही अभी अपना मकान बनना है.”
“भैस बंधोगे कहां?आँगन में दूसरी भैस ही मुश्किल से बंधती है.”
इस पर मैंने कहा आँगन को बढ़ा लूगा,पीछे वाला नही मानेगा तो डंडे से काम लूगा.”
यह सुनकर पत्नी बोली,”हाँ, यही तो हो ही रहा है दुनिया में.तीसरी के बाद तुम चौथी लोगे.भैसों का कोई अंत है,इस भैस संस्कृति के पीछे तुम्हारा वह स्वप्न क्या हुआ जिससे प्रेमचंद,गार्की वगैरह रहते थे,तुम्हारा चित्रकार कूंची उठता था.”
इधर में किताबों से,पेंटिंग से बिल्कुल टूट गया था,पर मैंने जैसे यह सब सुना ही नही और दूसरे दिन में तीसरी भैंस ले आया.

जनवरी 27, 2008

शिथिल होने के कारण पूरा काम नही कर सकती.
राजकर्मचारियो ने फिर सवाल किया-”हुजूर फकीर ने जो यह कहा था कि उसके पैर पड़ने से समुद्र सूख जायेगा,उसका क्या अभिप्राय था?’बादशाह ने मुस्कराकर जबाब दिया-”उसने मेरे इस कथन पर की खजाने में रूपये की कमी हो गयी है,व्यंग किया था.”उसका यह उत्तर वास्तव में चमत्कार पूर्ण था.अभिप्राय यह था कि जब वह इतना अभागा है कि महल में कदम रखते शाही खजाना खली हो गया तो उसके पैर रखने से समुद्र भी अवस्य सूख जायेगा.

जनवरी 27, 2008

और खजांची से बोला-”इन्हें १००० रूपये देदो.”
जब रूपये लेकर फकीर चला गया तो राज कर्मचारियों ने बादशाह से कहा-”सुनो अन्नदाता,आपकी और फकीर की बाते हुई,उन्हें हम बिलकुल नही समझ सके.”बादशाह ने कहा-सुनो! फकीर ने जो यह कहा था कि वह मेरा भाई है,एक तरह से उसका कहना ठीक था.जिस तरह में इस मुल्क का बादशाह हूँ,उसी तरह वह दीन (धर्म) का बादशाह है और इसके नाते वह मेरा भाई है.लक्ष्मी और दरिद्रता दो बहने है.मैं लक्ष्मी का पुत्र हूँ और वह दरिद्रता का बेटा है.
उसने जो यह कहा था कि जीर्ण होने के कारण उसका महल गिरने वाला है.उससे उसका अभिप्राय अपने शरीर से था जो बूढा होने के कारण निर्बल हो गया है और मृत्यु के करीब है.उसने जो यह कहा था कि उसके बत्तीस नौकर उसे छोड़ कर चले गये है.इससे उसका मतलब अपने दांतों से था जो अब गिर गये है.उसने अपनी रानियों के बारे मैं कहा था कि कमजोर होने कि वजह से उसकी सेवा नही कर सकती इससे उसका तात्पर्य अपनी आँख,कान इत्यादि पांच इन्द्रियों से था जो अब

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जनवरी 25, 2008

बादशाह ने खजांची को आज्ञा दी.इनको १०० रूपये देदो .
सौ रुपये सुनकर फकीर बोला-”अपने भाई को केवल आप सौ रुपये दे रहे है.मैं तो बहुत बड़ी आशा लेकर आपके पास आया था किन्तु आपने मेरा कुछ भी ख्याल नही किया.बादशाह ने जबाब दीया रियासत का खर्च ज्यादा होने की वजह से खजाने में रुपया बहुत कम है. इसलिए में आपकी बहुत अधिक सहायता करने में असमर्थ हूँ.
बादशाह की बाट सुनकर फकीर कहने लगा-”यदि आपके खजाने में रुपयों की कमी है तो आप मेरे साथ अफ्रीका महाद्वीप चलिए.वह सोने की खाने है.जितना धन चाहिऐ ले आइए.”बादशाह ने कहा-”बिच में समुद्र पड़ता है उसे कैसे पार करेगे?”फकीर ने कहा-”में आप के साथ चलूगा मेरे पैर जहा पड़ेंगे समुन्द्र अवश्य सुख जायेगा.”फकीर की बाट सुनकर बादशाह हशा

बादशाह और फकीर

जनवरी 25, 2008

पुराने ज़माने की बात हैं एक बादशाह था.वह बडा ही नेक और दयालु था,उदार भी था.जो कोई फकीर उसके द्वार पर पहुचता खाली हाथ नही लौटता था.
एक दिन की बात है,एक फकीर उसके दरवाजे पर पंहुचा.जिसके कपडे साफ थे किन्तु फटे हुए थे.उसने पहरेदारों से कहा-’बादशाह से कह दो उनका भाई मिलने आया है.”
बादशाह के कोई भाई नही था,यह बात पहरेदारों को मालूम थी.पहरेदार समझ गये की यह पागल है और उसपे हँसने लगे,किन्तु फकीर अपनी बात पर डटा रहा.उसके हाव-भाव तथा बातचीत में पागलपन का कोई चिन्ह प्रकट नही होता था. 
पहरेदार बादशाह के पास गया.उसने बताया की हुजूर एक फकीर आया है, जो अपने आप को आपका भाई बता रहा है.बादशाह कुछ देर तो चुप रहे फिर उन्होने मुस्कराकर कहा-”उसे बुला लाओ.”
फकीर जब बादशाह के पास पंहुचा तो बादशाह ने उसका बडा सम्मान किया और फिर उससे पूछा-”कहिए,भाई साहब आपने यह आने का कष्ट कैसे किया?”फकीर ने जवाब दिया,भैया,इस समय मैं बड़ी मुसीबत में हूँ.जिस महल में रहता हूँ वह पुराना होने के कारण गिरने वाला है. मेरे पहले बत्तीस नौकर थे वह अब छोड़ के चले गये है.उसके अलावा जो मेरी पांच रानिया थी वे भी निर्बल होने के कारण मेरी सेवा ठीक तौर से नही कर सकती.मैं आपके पास इस लिए आया हूँ कि मेरी कुछ सहायता कीजिए.

जब से इतने प्रखर हुए.

जनवरी 13, 2008

जितनी तपन मिली रहो मे उतने मुखर हुए.
जितनी चुभन मिली काटो मे उतने सुघर हुए.

छहों मे चलकर ही जितने अनुभव राहे अधूरे.
तपती दोपहरी मे चलकर उतने अजर हुए.

मलिन हुयी चिंतन धराए विष ही राहे परसते.
कहा ढूँढ़ते अमृत बूंदे इतने जहर हुए.

नित अदृश्य जिस परछाई से काँप गए चिंतन.
अंतरदृष्टी मिली है जब से इतने प्रखर हुए.

महादेवी वर्मा

जनवरी 11, 2008

महादेवी वर्मा (26 मार्च, 1907 — 11 सितंबर, 1987) हिन्दी की सर्वाधिक प्रतिभावान कवयित्रियों में से हैं। वे हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभोंमें से एक मानी जाती हैं।[ हिन्दी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने के कारण उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है।[२] कवि निराला ने उन्हें “हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती” भी कहा है।[ख] महादेवी ने स्वतंत्रता के पहले का भारत भी देखा और उसके बाद का भी। वे उन कवियों में से एक हैं जिन्होंने व्यापक समाज में काम करते हुए भारत के भीतर विद्यमान हाहाकार, रुदन को देखा, परखा और करुण होकर अन्धकार को दूर करने वाली दृष्टि देने की कोशिश की।[३] न केवल उनका काव्य बल्कि उनके सामाजसुधार के कार्य और महिलाओं के प्रति चेतना भावना भी इस दृष्टि से प्रभावित रहे। उन्होंने मन की पीड़ा को इतने स्नेह और शृंगार से सजाया कि दीपशिखा में वह जन जन की पीड़ा के रूप में स्थापित हुई और उसने केवल पाठकों को ही नहीं समीक्षकों को भी गहराई तक प्रभावित किया।[ग]

उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी की कविता में उस कोमल शब्दावली का विकास किया जो अभी तक केवल बृजभाषा में ही संभव मानी जाती थी। इसके लिए उन्होंने अपने समय के अनुकूल संस्कृत और बांग्ला के कोमल शब्दों को चुनकर हिन्दी का जामा पहनाया। संगीत की जानकार होने के कारण उनके गीतों का नाद-सौंदर्य और पैनी उक्तियों की व्यंजना शैली अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने अध्यापन से अपने कार्यजीवन की शुरूआत की और अंतिम समय तक वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या बनी रहीं। उनका बाल-विवाह हुआ परंतु उन्होंने अविवाहित की भांति जीवन-यापन किया। प्रतिभावान कवयित्री और गद्य लेखिका महादेवी वर्मा साहित्य और संगीत में निपुण होने के साथ साथ[४] कुशल चित्रकार और सृजनात्मक अनुवादक भी थीं। उन्हें हिन्दी साहित्य के सभी महत्त्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है। भारत के साहित्य आकाश में महादेवी वर्मा का नाम ध्रुव तारे की भांति प्रकाशमान है। गत शताब्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला साहित्यकार के रूप में वे जीवन भर पूजनीय बनी रहीं। वर्ष 2007 उनकी जन्म शताब्दी के रूप में मनाया जा रहा है।

जो तुम आ जाते एक बार ।

जनवरी 11, 2008

जो तुम आ जाते एक बार ।

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग
आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार ।

हंस उठते पल में आद्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग
आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार ।

- महादेवी वर्मा


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