जितनी तपन मिली रहो मे उतने मुखर हुए.
जितनी चुभन मिली काटो मे उतने सुघर हुए.
छहों मे चलकर ही जितने अनुभव राहे अधूरे.
तपती दोपहरी मे चलकर उतने अजर हुए.
मलिन हुयी चिंतन धराए विष ही राहे परसते.
कहा ढूँढ़ते अमृत बूंदे इतने जहर हुए.
नित अदृश्य जिस परछाई से काँप गए चिंतन.
अंतरदृष्टी मिली है जब से इतने प्रखर हुए.